अफसर जिसने हाथ पर बनवा रखा है “Saving Wild Tigers” नाम का Tattoo

Saving Wild Tigers: ये वही जंगल है, जहां मैं पैदा हुआ, पला-बढ़ा। इसकी ऊबड़-खाबड़ देह पर दौड़ता रहा। सैकड़ों बार गिरा पर इसने हमेशा मुझे संभाला-दुलार किया। इस धरती की कोख में पनप रही वनस्पतियों और पेड़-पौधों ने मुझसे कभी कुछ मांगा नहीं, सिर्फ दिया है। इसके आंचल में समाए असंख्य जीव-जंतु मेरे सच्चे मित्र है। उनकी रक्षा के लिए मैं प्रतिबद्ध हूं। शरीर पर खाकी रहे न रहे, लेकिन मैं जंगल और यहां के जीव-जंतुओं को बचाने के लिए अपने प्राण भी दे दूं तो शायद कर्ज अदा नहीं कर सकूंगा। ये विचार हैं वन अफसर संदीप सिंह के।

इस दौर में ये पढ़कर आपको थोड़ा अटपटा जरूर लग रहा होगा। जहां भ्रष्टाचार-बेइमानी और फरेब के किस्से सुनने को मिलते हैं, उनके बीच एक शख्स ऐसा भी है, जिसे जंगल को मां कहते हुए फख्र होता है। अचानकमार टाइगर रिजर्व के सुरही रेंज के अफसर संदीप सिंह खुद को वन का सिपाही मानते हैं। उनका कहना है कि मैंने शपथ ली है कि मैं अपने कार्यकाल में ही नहीं, अपितु जीवनकाल में इस प्रकृति मां की रक्षा के लिए कार्य करता रहूंगा। उन्होंने अपने दिलो-दिमाग पर रची-बसी बात (Saving Wild Tigers) को सारी उम्र के लिए अपने हाथ पर गुदवा रखा है।

कौन है संदीप सिंह ?

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संदीप सिंह’ अचानकमार टाइगर रिजर्व के सुरही रेंज के अफसर हैं, जंगल और जंगल के जानवरों के प्रति इनकी दीवानगी कहू तो शायद अतिश्योक्ति नहीं होगी क्यूंकि इन्होने अपने दिमाग में लिखी बात को हाथ पर ‘सेविंग वाइल्ड टाइगर्स’ के रूप में गुदवा रखा है। शायद ही कोई ऐसा वन अफसर हो जो वन्य जीवन के प्रति अपने समर्पण भाव को शरीर के अंग पर ता-उम्र के लिए गुदवा ले। पूछने पर संदीप बताते हैं की पिता स्वर्गीय बैजनाथ सिंह जंगल विभाग के ही मुलाजिम थे, ये नौकरी उन्हें उनकी मृत्यु के बाद मिली है।

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चूँकि पिताजी वन महकमें का हिस्सा थे लिहाजा पैदा होने से लेकर आज तलक जंगल से बिछड़कर बाहर कहीं जाने का मौक़ा ही नहीं मिला। वो बताते हैं एक बार कोशिश की और मिलिट्री की सेवा ज्वाइन भी कर ली लेकिन जिंदगी को जंगल की कमी खलने लगी, कुछ महीनों के बाद मिलिट्री की सेवा छोड़कर घर लौट आये। ‘संदीप सिंह’ के पिता राज्य के बस्तर इलाके में पदस्थ रहे, संदीप ने उस जंगल में बचपन और जवानी बिताई है जो आज लाल आतंक का गढ़ माना जाता है। इन्होने 2004 में वन सेवा की शासकीय नौकरी ज्वाइन की, अपनी चौदह साल की सेवा में इस वन अफसर ने कई उतार-चढ़ाव भी देखे हैं

कांकेर में रहने वाले ‘संदीप सिंह’ कहते हैं की जंगल के सिस्टम को समझना बेहद जरूरी है, वन के दुश्मन दशकों से पर्यावरण और पुरे इको सिस्टम को बिगाड़ने में लगे हुए हैं लेकिन आज वन सेवा और उससे बाहर के असंख्य ऐसे वन योद्धा हैं जो प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से कर्तव्य पथ पर अपने प्राणों की परवाह किये बगैर वन की रक्षा में मुस्तैद हैं।
Saving Wild Tigers क्यों बनवाया ?

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हाथ पर गुदे “Saving Wild Tigers” के सवाल पर संदीप मुस्कुरा कर कहते हैं आज देश भर में बाघ संरक्षण के लिए प्रयास जारी हैं, उनकी लगातार कम होती संख्या निश्चित रूप से चिंता का विषय बनी हुई है। उन्होंने बताया की जंगल में रहने वाली आदिवासियों की विभिन्न जनजातियां शरीर पर अपनी-अपनी मान्यता और सभ्यता के अनुरूप गोदना गुदवाती है चूँकि मेरा जीवन भी जंगल की गोद में पला-बढ़ा है और परिवार ने जंगल के हर मिजाज को करीब से देखा समझा है लिहाजा मैंने हाथ पर उस बाघ को बचाने की अपील करता गोदना गुदवा रखा है जो मानव प्राणी के लिए ही ख़ास नहीं बल्कि इस प्रकृति के इको सिस्टम को संतुलित करने में सबसे अहम् भूमिका निभाता है। संदीप ने अपने जीवन के लक्ष्य को एकदम स्पष्ट रखा है, वन सेवा में रहते और वन सेवा के बाद भी सिर्फ और सिर्फ वन्य जीवन के लिए लड़ते रहना उनका मूल लक्ष्य है, इसके लिए चाहे जिस विषम परिस्थिति से गुजरना पड़े।

इस वन योद्धा की बातों को सुनकर मैं इस निष्कर्ष पर पहुंचा हूँ कि इंसान में अगर कर्तव्यनिष्ठा हो तो उसे अपने ऊपर पूरा विश्वास रहता है । वह कभी ऐसा नहीं सोचता कि दूसरे उसके बारे में क्या सोच रहे होंगे। वह तो बस अपने कार्य की गुणवत्ता को बड़ी सावधानी से कायम रखने की कोशिश करता है। मनुष्य की जिंदगी में बदलाव तभी मुमकिन है, जब वह पूरी तत्परता से हर काम को निबटाए।

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Source: BLOG and PC: Satyaprakash Pandey,

 

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