Letters from Kargil: कारगिल में शहीद हुए पिता के पत्रों से लिख डाली मार्मिक किताब

दीक्षा द्विवेदी की किताब लेटर्स फ्रॉम कारगिल(Letters from Kargil) में 1999 में भारत और पाकिस्तान के बीच हुए युद्ध में शामिल सैनिकों के पत्रों के हवाले से उनकी मनःस्थिति और जमीनी हालात को समझने का प्रयास किया गया है।जगरनॉट प्रकाशन से आई इस किताब में लेफ्टिनेंट प्रवीण तोमर का खत भी शामिल है जो उन्होंने अपने दोस्त गगन को लिखा था। कारगिल युद्ध के समय लेफ्टिनेंट प्रवीण कुमार महज 23 साल के थे।

महज पांच महीने पहले ही प्रशिक्षण पूरा करके सेना में शामिल हुए थे। वो 2 राजपुताना राइफल्स के हिस्सा थे। कम उम्र के कारण उन्हें बटालियन का “बेबी” कहा जाता था। मई 1999 में शुरू हुआ कारगिल युद्ध जुलाई के आखिर में खत्म हुआ था।

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25 जून 1999 को लिखे इस पत्र में प्रवीण कुमार ने शुरू में ही अपने दोस्त गगन को बताया है कि कारगिल में बदले हालात की वजह से वो उनके खत का जवाब देरी से दे रहे हैं। पत्र में प्रवीण कुमार ने अपने दोस्त को बताया है कि राजपुताना राइफल्स के जवानों ने द्रास सेक्टर की तोलोलिंग चोटी पर 12-13 जून की रात को दोबारा कब्जा कर लिया था। प्रवीण कुमार की टीम अग्रिम टुकड़ी थी। उनसे आगे 18 ग्रेनेडियर का दस्ता था जिसे चोटी पर कब्जा करने में करीब 20 जवानों को खोना पड़ा। मारे गए लोगों में एक सेंकड इन कमांड और एक मेजर अधिकारी भी थे। प्रवीण कुमार ने लिखा है, “ये लक्ष्य मुश्किल था और हमें साफ आदेश था। तोलोलिं पर किसी भी कीमत पर नियंत्रण करना है। हमने अपना लक्ष्य हासिल कर लिया लेकिन इसकी मेरी टुकड़ी ने भारी कीमत चुकायी है।”

diksha dwivedi letter from kargil

प्रवीण कुमार ने अपने दोस्त को लिखा, “मेरे अगली कतार के सिपाही पूरी तरह साफ हो गये। वो या तो मारे गये या घायल हो गये और मेरी बाकी प्लाटून भी पस्तहाल है। ये चमत्कार ही है कि अग्रिम टुकड़ी में होने के बावजूद मैं जिंदा और सुरक्षित हूं। मेरे पीछे और आसपास के लोग घाल हो गये थे, मैं बाल-बाल बचता रहा। मैंने पांच मीटर दूर उड़ते हुए चीथड़े देखे लेकिन मैं सुरक्षित बच गया। दरअसल मैं एक चट्टान पर चढ़ गया जिससे एक लैंडमाइन फट गयी। मैं धमाके से गिर पड़ा। मुझे गिरते देख लोगों को लगा कि मेरा पैर गया। अगले दिन लोग इस बात पर हैरान हो रह थे। दूसरों की किस्मत मेरे जितनी अच्छी नहीं थी। मेरी टुकड़ी के आठ लोग शहीद हो गये….मेरे 12 साथी अस्पताल में हैं।”

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प्रवीण कुमार ने अपने दोस्त गगन को इस विजय के बाद सेना और मीडिया से मिलने वाली तवज्जो और तारीफ के बारे में भी बताया है। प्रवीण कुमार ने लिखा है, “राजपुताना राइफल्स के सेंटर कमांडर ने बटालियन के हर अफसर को निजी तौर पर पत्र लिखा है और तब से मैं पत्रकारों से बातचीत में व्यस्त हूं। कुछ विदेशी पत्रकारों ने भी मेरा इंटरव्यू किया। संभव है कि इंडिया टुडे हमारी उपलब्धि पर फीचर प्रकाशित करे।

प्रवीण कुमार ने युद्ध को भयावह और पीड़ादायक बताते हुए लिखा है कि ऐसे में जवानों को अपने सर्वोत्तम, यहां तक कि अपनी जान तक देने के लिए प्रेरित करना होता है और साथ ही साथ अपने अंदर के डर से भी लड़ना पड़ता है। प्रवीण कुमार ने अपने दोस्त को बताया कि वो युद्ध के मैदान में भी वो उनका पत्र लेकर गये थे। उन्होंने बताया कि युद्ध के दौरान वो 24 घंटे तक बगैर पानी और भोजन के रहे। प्रवीण कुमार ने पत्र के आखिर में लिखा है, “प्लीज, मुझे पत्र लिखने के लिए समय निकालना। यहां काफी अकेलापन है और मैं घरवालों को भी खत नहीं लिख सकता क्योंकि उन्हें परेशान नहीं करना चाहता। इसलिए, प्लीज, प्लीज जल्द जवाब देना…तुम्हारा प्रवीण कुमार”

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